ख़ुद को मैं तुम में पाता हूँ

ख़ुद को मैं तुम में पाता हूँ

इस मासूम से चहरे में खो सा जाता हूँ

सोचा ही नहीं था के दिल पसीज जाएगा किसी के कहकहे से

लेकिन हंसी सुन के तुम्हारी एक सुकून सा पाता हूँ

आँखों के सामने जब पहली बार तुम्हारा चेहरा आया था

मेरी नन्ही सी गुड़िया ने जो रो के दिखाया था 

हक्का बक्का सा रह गया था मैं

ऐसा लगा था ख़ुशियों की बरसात में सदियों बाद मैं नहाया था

जब खोली तुमने कुछ दिन बाद अपनी बंद आँखें

जीवंत हुआ मैं ऐसा के लगे फिर से शुरू हो गयीं हों मेरी बोझिल सासें

बस आस पास ही तुम्हारे ख़ुशनुमा माहौल में खुश होता चला गया मैं

क्यूकीं तुम हो वो प्यारा सा फूल जो मुस्कुराहटों को अपने शरारत भरे जाल में फाँसे

देखते ही देखते तुम्हारी अठखेलियाँ और उच्छलकूद जो बढ़ती चलीं

महीनों के साथ वो प्यारी प्यारी शैतानियाँ भी उमड़ती चलीं

तुम ही तो हो मेरी पूनम की रात और मेरा उगता हुआ चमकदार सूरज

तुमसे ही मेरी ख़ुशी है ज़िंदा ओह मेरी नन्ही परी

जानता हूँ ये पल यूँ ही झटपट निकल जाएँगे

लेकिन ये शैतानियाँ ये अल्हड़पना और ये किलकारियों की ध्वनियाँ मेरे मन की गहराइयों से दूर कभी ना हो पायेंगे

अभी तो बस एक छोटी सी प्यारी सी एक ख़ुशियों की गठरी हो तुम 

है मुझे यक़ीन के जीवन के आने वाले कठिन रास्तों में चलते हुए हम आगे बढ़ते हुए बस हँसेंगे और हसायेंगे 

बस यही फिर से कहना मैं चाहता हूँ

ख़ुद को मैं तुम में पाता हूँ

याद नहीं आता कोई भी पल ऐसा जिसमें तुम नहीं होती हो अब

कल जो हम साथ में हंसे और खेले उसको याद करते हुए रात में नींद की गहराइयों में खो सा जाता हूँ

ख़ुद को मैं तुम में पाता हूँ

ख़ुद को मैं तुम में पाता हूँ

This is a poem I penned for my precious daughter when she was just six months old and I found myself away from her and my wife in a different city. My heart ached with longing for her, and through these words and rhymes, I poured out my emotions, capturing the love I hold for her and what she means to me!

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